Saturday, 15 June 2019

सभ्यताओं!

अरी ओ बहरी सभ्यताओं!
सुनो...!
कवित्त नहीं है
यह चीत्कार है
किसी अपने की
किसी अपने हेतु पुकार है!

तनिक आओ तो
देखो तो सही
कैसे हमारी छाती पर
हुक्कामों के पाँव हैं
मानो वो समझ गए हैं
हम टूटी हुई नाव हैं!

अरे बताओ तो
तुम्हें कौन सी क्रान्ति चाहिए
उठ कर खड़े होने को!
जब तुम्हें दो आँसू भी नहीं
हम अभागों पर रोने को!!

हम लड़ रहे हैं
हारा हुआ समर
जूझ रहे हैं,
इधर,उधर!

भला क्यों...किसके लिए?
ओ बहरी सभ्यताओं!!

पहिला अनइस के!

चलो

गाल बजाते हैं!

हाकिमों, हुक्कामों को

मजा चखाते हैं!

कागज काले कर

जय विजय चिल्लाते हैं!

कूप मण्डूकों को

समन्दर पहुँचाते हैं!

बुरकानशीनों से

मोमबत्ती जलवाते हैं!

यूँ ही तो नहीं

ये सारे मारे जाते हैं!

इनकी मरम्मत को

पैसे बहुत आते हैं!!

कोई निरपराध को मारे!

कैसा हठ है...!

सुन सकोगे तुम
मेरे मौन को?
अन्तःस्थल में जो
चुप श्वास लिया करती है?

अतीत के ये झञ्झावात
केवल तुम्हें नहीं व्याप्त!
पथरीली चट्टानों पर भी
बूँदें गिरा करती हैं!!

स्याह से स्निग्ध की
यह यात्रा ही जीवन है!
स्वयँ से कही बातें
वे आत्माएँ सुना करती हैं!!

आयु आधी अधूरी
पर गाँठ में पूरी!
जो कारी कमरिया में
हीरे जड़ा करती है!!

छोड़ दो यहाँ एक
दीर्घ निःश्वास!
किसी से क्या कहना
मृत्यु सब कहा करती है!!

१५० का मटीरियल

मोहनदासी
सौ सौ फाँसी
टका टका गिन!
***
परम वैष्णव
थोथा कलरव
चरखा टिनटिन!
***
सुनो अभागे
अल्ला राखे
चार मलेछिन!
***
दे हरकारा
वही दुलारा
बाकी भिनभिन!

Sunday, 2 June 2019

मज़हब के करम!

इक नन्हीं मुन्नी सी परी
आँखें उसकी जादू भरी!
भोर भये ही उठ जाती है,
उठती नहीं अम्मीं उठाती है!!

वक्त से पहले जाग उठी है,
बाँध दामनी आह उठी है!
लट उलझी थी सुलझाती है,
खुद को जानें क्या समझाती है!!

आँखें मल अलसाया बचपन,
वुजू करे कुम्हलाया बचपन!
कैसी पीड़ा है क्या कहिए,
उम्र कहाँ कि सजदे करिए!!

मस्जिद का भोंपू बोला है,
उफ़ उसका बचपन डोला है!
चाँद का टुकड़ा कहने को है,
अभी नमाज़ें पढ़ने को है!!

नन्हीं नन्हीं सी हथेलियाँ,
वहाँ लकीरें या पहेलियाँ!
लोगों से वह जुदा कहाँ है,
पूछा उसनें खुदा कहाँ है!!

भोली सी है सीधी सी है,
अब भी नज़र उनींदी सी है!
अम्मी जबरन मुँह धोती है,
वह बेचारी रो देती है!!

क्या मजहब में बच्चा होना,
गुड्डा गुड़िया हँसना रोना!
अल्ला से पूछेगी जाकर,
क्या पाते हैं उसे जगाकर!!

Saturday, 1 June 2019

ईद मुबारक

अबे तुम हिस्सेदार कहाँ, सीधे सरकार हो बे!

सँविधान तुम्हारे हेतु ही तो है। आओ हमारी छाती पर चढ़ मूँग दलों। हम उफ तक नहीं करेंगे। हमारी प्राथमिकता सदा से सेक्युलरिज्म है, गजवा-ए-हिन्द तुम्हारी। हमारी क्या औकात कि तुम्हें किराएदार कहें!

तुमने हमसे पाकिस्तान लिया, हमने कुछ कहा? कश्मीर, केरल, बङ्गाल भी ले लो....हम कुछ नहीं कहेंगे। यावद् जीवेत् मानते हैं हम... वसुधैव कुटुम्बकम् भी!

हमारी हम दो हमारे दो स्कीम में तुमने सेंध लगायी... हमने कुछ कहा? हमारे धन्धों पर बैठे... हमने कुछ कहा?

हमारी सँख्या घटती गयी, तुम्हारी बढ़ती गयी... हमने कुछ कहा?

तुम आज सेकेण्ड लार्जेस्ट हो, यह पीर हमें बेहद दुःख देती है। तुम प्रथम नियन्ता हो जाते तो चित्त को शान्ति मिलती। बताओ कितना सुन्दर दृश्य होता नऽ! तुम एक ओर से आवाज देते अल्ला हो अकबर....हम अपने अपने दड़बों में सिमट कर रह जाते! तुम सड़कों पर तकरीरें करते, हम बिलों में घुस जाते! वाह....सोच कर ही रोमाञ्च हो आता है।

तुम अपने प्रयत्नों में जी जान से लगे रहो! हम इस धरा पर अवतरित ही इस हेतु हुए हैं कि विश्व को अपनी कूप मण्डूकता के प्रत्यक्ष दर्शन करा सकें। हमारी चिन्ता स्वयँ परमात्मा करते हैं। हम किसी के आश्रित नहीं!

चले हऽर ना चले कुदारी...बइठल भोजन देलें मुरारी...यह हमारा घोष वाक्य है!

हमें प्रतीक्षा है उस क्षण की जब तुम हमारा नाम-ओ-निशाँ मिटा दो और हम स्वर्ग पहुँचे अपनी सहिष्णु शिक्षाओं के दम पर!

तुम्हें एक जन्म ही तो मिला है अपने अधूरे कार्य सम्पादित करने को? हमें ८४ लाख योनियों में भ्रमण करना है...हम कहीं न कहीं एडजस्ट कर लेंगे। चिन्ता नक्को! आओ गले लगो...ईद मुबारक कह दें! क्या खबर कल जिन्दगी रहे न रहे!

#ईद_मुबारकओवैसीभाई
#अस्लाम_अलैकुम

Saturday, 25 May 2019

मन की बात -१

आदरणीय प्रधानमन्त्री जी!

क्या हम सब इस अद्भुत विजय का उत्सव इसी भाँति सहज भाव से मनाएँ? आपकी यह प्रचण्ड विजय क्या इस बात की द्योतक नहीं कि जनमानस आपके द्वारा किए जा रहे कार्यों से यदि सन्तुष्ट नहीं तो असन्तुष्ट भी नहीं? पलड़े कुछ डाँवाडोल हैं किन्तु आप सदा ही सही तौल करेंगे ऐसी आशा का स्पष्ट जनादेश ही तो है यह?

विजय सम्बोधन में आपने कहा...आप बदनीयती से कार्य नहीं करेंगे। सुखद व अनुकरणीय है यह वक्तव्य... किन्तु हमें इसके स्पष्ट परिणामों की व्याकुलता से प्रतीक्षा रहेगी कि क्या भारतवर्ष को यहाँ कोई दूसरा गाँधी मिल गया है? स्वतन्त्रता सङ्घर्ष में १९४२ से १९४७ के आप द्वारा उद्धृत उस कालखण्ड में धनी-निर्धन तथ्य के इतर और भी अनेक मुद्दे थे जिन्हें हल करने की मोहनदासी परम्परा समाज को कम से कम अब स्वीकार्य नहीं। आपसे अधिक परिपक्वता की आशा है क्योंकि हम यह मानते हैं कि इस सतत् परिवर्तनशील विश्व में किसी बिन्दु पर ठहराव सदैव आत्मघाती ही होता है चाहें वह मोहनदासी परम्परा ही क्यों न हो!

यदि राम व राम के आदर्शों की बात करुँ तो सम्भवतः मैं त्याज्य हो जाऊँगा आपकी दृष्टि में किन्तु यह आप भी समझते ही होंगे कि राम ही वह आलम्ब हैं जिनके चारों ओर किसी विष बेल सी लिपट कर मोहनदासी परम्परा फलती फूलती रही व कालान्तर में राम के अस्तित्व को यादृच्छया ढ़क कर ओझल कर दिया।

यह स्पष्टत: मेरा और आपका सँवाद है। आप सदा सदा उस विराटता का अनुभव करें जो विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी अवधारणा से अवगत कराता है किसी यहूदी, इस्लामी, ईसाई या अन्य किसी भी मत मतान्तर की असहिष्णु परम्पराओं से इतर! यह भारतवर्ष का दुर्भाग्य कि सेक्युलरिज्म की मलाई खा-खा थाली में छेद करने वालों को स्वतन्त्रता पूर्व भी ढूँढ ढूँढ कर सम्मानित किया गया जिसके फलस्वरूप उनकी सन्ततियाँ आज भी बहुसङ्ख्यकों की छाती पर चढ़ मूँग दलना अपना अधिकार समझती हैं।

किसी अन्य आकाङ्क्षा से इतर यहाँ मेरा एकमात्र प्रयोजन बहुसंख्यकों के मतान्तरण में लगी शक्तियों के प्रतिकार से है जिस ओर आप का ध्यानाकर्षण मुख्यधारा की उन शक्तियों को सम्बल प्रदान करेगा जो यथाशक्ति उनके प्रतिकार में लगे हुए हैं। दिन दूनी रात चौगुनी गति से जनसङ्ख्या वृद्धि करते इस्लामी समूह तो हैं ही गजवा-ए-हिन्द की ताक में!

आप को सलाह तो क्या दूँगा, हाँ यह मेरी आकाङ्क्षाएँ अवश्य हैं व यह आशा भी कि प्रचण्ड बहुमत के यह पाँच वर्ष भारतवर्ष हेतु भारतीय मूल्यों के उत्कर्ष के वे स्वर्णिम पाँच वर्ष होंगे जिन्हें आपका नेतृत्व प्राप्त करेगा।

इस जनादेश हेतु असङ्ख्य शुभकामनाएँ।

जय श्री राम 🙏