'आलसी' के पदचिह्नों पर
Tuesday, 27 April 2021
चित्रलेख -१
Sunday, 7 March 2021
'ऋत की तृषा'
Wednesday, 2 September 2020
'बकासुर की गोद में'
Saturday, 9 May 2020
युग कथा-१
Friday, 3 January 2020
वो रेख़्ता में सब पर थूक फेंकता अजीमोश्शान शाइर...!
१:- )
"न आज लुत्फ कर इतना कि कल गुजर न सके!
वो रात जो कि तिरे गेसुओं की रात नहीं!!"
मने आज चाँपे रहे तुम अच्छी बात है, पर जब कल तुम्हारे शौहर आ जाएँगे तो हमारा गच्चीजन तो हो नहीं पाएगा! रात अकेली होगी, हम अकेले होंगे! तुम तो बाहों में रहोगे अपने साजन की! तो मियाँ....अपने हुजरे में बैठै ठाले इकल्ले मैं करुँगा क्या? लँड़चटई?
हाँ बे सितमगर जमाने...! चूरन तो हो तुम...!
हम अपना खुदा खुद बनाते पर क्या करें, हमारे 'वस्ल' को जमाना 'कचाने' जैसा कुछ समझता है!
२:-)
"हज़ार दर्द शब-ए-आरजू की राह में है,
कोई ठिकाना बताओ कि काफिला उतरे!
करीब और भी आओ कि शौक-ए-दीद मिटे,
शराब और पिलाओ कि कुछ नशा उतरे!!
मने हमारी इबादतें, मोहब्बतें सब तुमको ठरक़ ही दिक्खा करें है? रात भर कुड़कुड़ाती हैं हड्डियाँ मानों! एक कम्बख्त़ तो हड्डियाँ तुड़ा बैठा...हमसे दो चार लट्ठ भी न खाए जाएँगे भला? हमें उस सुर्ख चेहरे पर चमकती दो आँखों की कसम उस्ताज़....नाली में गिरें या कि मक़ाँ और कहीं हो....तुम चाटने दो शीशियाँ अङ्गूर के बागों की!
सचमुच तुम्हें शाइरी की समझ नहीं कम्बख्तों, तुम क्या समझो कि....
३:-)
जब्त का अहद भी है, शौक का पैमान भी है!
अहद ओ पैमाँ से गुजर जाने को जी चाहता है!!
दर्द इतना है कि हर रंग में है महश़र बरपा!
और सकूँ ऐसा कि मर जाने को जी चाहता है!!
अब रहन दे साकी....मीना बाजार बन्द कर अपना! तेल निकाल दिया बहन की लौ* ने! रैण दे इन्हे पोएट्री का पूँ बी नहीं पता! हम कराहें ना तो क्या कहें!!
हम देखेंगे!
अगला पिछला सब देखेंगे!
काला उजला सब देखेंगे!
जब पाएँगे तब देखेंगे!
हम देखेंगे, सब देखेंगे!
🙂
#फैज #थुख्तर #नूरजहाँ
Sunday, 22 December 2019
छिनरी का स्वप्न...!
Saturday, 21 September 2019
सङ्कर शङ्कर....!
सङ्कर को वायु पुराण के इसी वक्तव्य की सहायता से समझें तो यह क्षत्रिय इन्द्र के हविष्य में ब्राह्मण बृहस्पति के हविष्य मिलने की बात करता है। हविष्य को याज्ञिक अनुष्ठान में प्रयुक्त होने वाली आहुति से समझें तो दो भिन्न आह्वानों अथवा गुणों के एक होने से उत्पन्न अवस्था सूत अवस्था है। यहाँ तामस भाव का कोई वर्णन नहीं, सो त्याज्य होने का प्रश्न ही नहीं। देवगुरु बृहस्पति का उच्चतम आदर्श व देवेन्द्र इन्द्र के तेज की सार्वभौम स्वीकृति उस पद का सृजन करती है जिसे सङ्कर अथवा सूत कहा गया।
परम्परा से उन्हें धर्म क्या दिया गया? देवताओं, ऋषियों, व उच्च आदर्श प्रतिष्ठित राजन्यों तथा मनीषियों द्वारा प्राप्त सुवचनों को धारण करने का या आचरण में लाने का!
क्या सङ्कर अथवा सूत वह परम्परा नहीं जो ब्रह्मज्ञान व क्षात्रतेज को आदर्शों के अत्युच्च शिखर तक प्रतिष्ठित रखने की बात करता है? रामकथा भी प्रारम्भ में शिवजी ने उमा से कही थी नऽ? कैलाशवासी शङ्कर? सबसे निराले?
होल्ड, होल्ड.....अब कोई लाठी मत भाँजने लग जाना हम पर! 🙂
गरीब मनई हूँ मालक! 😁